Sign In

पारिजात के दिव्य वृक्ष का महत्व और उनके चमत्कारी फायदे | Parijat ke Phool

पारिजात के दिव्य वृक्ष का महत्व और उनके चमत्कारी फायदे | Parijat ke Phool

Article Rating
3.5/5

पारिजात के वृक्ष को हिन्दू धर्मशास्त्रों  में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथा पवित्र स्थान दिया गया है । पारिजात के वृक्ष दिखने में बहुत ही आकर्षक होते है तथा इनपर बहुत ही खूबसूरत पुष्प लगे होते है जिनका सुगंध बहुत ही मनमोहक होता है।

पारिजात के वृक्ष को और भी विभिन्न नामो से जाना जाता है जैसे की हरसिंगार, सिउली, शेफालिका, पार्द्क, सिंघार इत्यादि। परिजात के वृक्ष पूरे भारत में पाए जाते है तथा इसके पुष्प भारत के पश्चिम बंगाल राज्य का राजकीय पुष्प भी कहलाता है ।  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पारिजात वृक्ष से बहुत सारी पौराणिक कथाएं जुडी हुई है तथा यह वृक्ष स्वयं में बहुत कुछ छिपाये हुए है कुछ वरदान तथा कुछ अभिशाप भी।  उत्तर प्रदेश इटावा वन विभाग में हजारो वर्ष पुराने 4 वृक्षों में से 2 वृक्ष आज भी पर्यटनकारियों के लिए खाश है, हिन्दू मान्यता अनुसार ये वृक्ष समुन्द्र मंथन के समय देवो और असुरो के बिच हुए युद्ध-संग्राम के बारे में बतलाता है। आज हम आपको पारिजात के वृक्ष से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य तथा उनके चमत्कारिक फायदें बताएंगे, तो चलिए शुरू करते है: 

 

पारिजात के वृक्ष से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य:

आमतौर पर पारिजात के वृक्ष की उचाई 10 से 15 फीट तो कहीं-कहीं पर 20 से 25 फीट की उचाई लिए हुए होते है। पारिजात के वृक्ष को विशेष कर लोग अपने बाग़ बगीचो में लगाते है।  हिमालय की नीची तराइयों तथा मध्यभारत में विशेष तौर से ये वृक्ष पाएं जाते है। पारिजात के पुष्प का रंग सफ़ेद और मध्य में नारंगी रंग लिए हुए होते है। पारिजात वृक्ष का वानस्पतिक नाम ‘निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस’ है।  पारिजात के पुष्प अपने मनमोहक सुगंध के साथ रात में खिलकर सुबह डालियों से बिखर कर धरती पर गिर जाते है।

 

पारिजात के उत्पत्ति का रहस्य:

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार समुन्द्र मंथन से उत्पन्न यह दिव्य पारिजात वृक्ष देवताओं के राजा इंद्र ने अपनी वाटिका में लगवा दी थी। एकबार देवऋषि नारद ने भगवान श्री कृष्ण को इन्ही पारिजात के पुष्पों से बनी माला भेंट की जिसे प्रभु श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी देवी रुक्मणि को दिया, देवऋषि नारद ने लक्ष्मी स्वरूपा देवी रुक्मणि को कहा की वो इस माला को पहनकर श्री कृष्ण की सभी रानियों से भी ज्यादा सुन्दर दिख रहीं है । यह बात जब प्रभु श्री कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा को पता चली तो वो प्रभु श्री कृष्ण से जिद्द करने लगी की उन्हें पारिजात का वृक्ष चाहिए। तब प्रभु श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के लिए पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से धरती पर लाया।  

 

श्रापित है पारिजात:

अपनी पत्नी सत्यभामा के जिद्द के वजह से भगवान श्री कृष्ण पहुंचे देवलोक पारिजात के वृक्ष को लेने के लिए परन्तु इंद्र देव ने पारिजात देने से इंकार कर दिया जिसके वजह से प्रभु श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र से युद्ध किया और विजय के पश्चात पारिजात वृक्ष को धरती पर लाने लगे, जिसे देख देवराज इंद्र ने पारिजात के वृक्ष को श्राप दिया की पारिजात का पुष्प हमेशा रात में ही खिलेंगे और सुबह डालियों से झड़ कर गिर जायेंगे। 

 

भूमि पर गिरे फूलो से ही होती है पूजा:

भूमि पर गिरे हुए पुष्पों को ही पूजा में शामिल किया जाता है । पर इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है, जब श्री कृष्ण पारिजात का वृक्ष लेकर आये तो उन्होंने पारिजात को इस तरह से धरती में लगाया, जिससे कि पारिजात की जड़ तो देवी सत्यभामा के आँगन में आता परन्तु उसकी तना देवी रुक्मणि के आँगन में आता, जिससे कि उसके सारे फूल झड़ कर देवी रुक्मणि के आँगन में ही गिरते, उन्ही गिरे हुए फूलो से देवी रुक्मणि अपना श्रृंगार करती, इसी कारण से  इसे हरसिंगार भी कहा जाता है।

 

पारिजात के महत्वपूर्ण फायदें:

  1. आयुर्वेद के अनुसार अगर हम 15 से 20 पारिजात पुष्प का सेवन या उन पुष्पों का रस पीते है तो ह्रदय सम्बंधित सारे रोग आसानी से दूर हो जाते है, लेकिन इस उपाय को आजमाने से पहले किसी चिकित्सक से परामर्श अवश्य ले।
  2. इसके फूलो के मनमोहक सुगंध से स्ट्रेस भी कम हो जाता है।
  3. इसकी पत्तियां तथा छाल को उबालकर पिने से सर्दी जुकाम तथा बुखार में काफी आराम मिलता है।
  4. पारिजात पुष्प उदर सम्बंधित रोग के इलाज में भी काफी मददगार है।